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6/8/2022
Sprout Moong Chaat: वेट लॉस जर्नी में नहीं करना चाहते स्वाद से समझौता, ट्राई करें ये टेस्टी और हेल्दी डिश
स्प्राउट्स खाना सेहत के लिए कितना फायदेमंद होता है, यह तो हम सभी जानते हैं। लेकिन इसके स्वाद के चक्कर में सभी इससे मुंह मोड़ लेते हैं। ऐसे में आप इसकी टेस्टी और हेल्दी चाट बनाकर खा सकते हैं।




अच्छी खबर है धन्यवाद इसी तरह भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीया को संपूर्ण पूर्वी उत्तर भारत में कजरी तीज का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर सुहागिनें कजरी खेलने अपने मायके जाती हैं। ये महिलाएं नदी- तालाब आदि से मिट्टी लाकर उसका पिंड बनाती हैं और उसमें जौ के दाने बो देती हैं। रोज इसमें पानी डालने से पौधे निकल आते हैं। इन पौधों को कजरी वाले दिन लड़कियां अपने भाई तथा बुजुर्गो के कान पर रखकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इस प्रक्रिया को जरई खोंसना कहते हैं। इसके एक दिन पूर्व यानी भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया को श्रतजगाश् का त्यौहार होता है। महिलाएं रात भर कजरी खेलती हैं। कजरी खेलना और कजरी गाना दोनों अलग चीजें हैं। कजरी का यह स्वरूप केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित है। खेलने के इस स्थान को चौघट कहते हैं। यह खेल गायन करते हुए किया जाता है। जो देखने और सुनने में अत्यंत मनोरम लगता है। गाये जाने वाले गीत को कजली अथवा कजरी कहा गया। कजली तीज के रोज जी भर कजरी गाने-गवाने का कार्यक्रम चलता रहता है। कजरी-गायन की परंपरा बहुत ही प्राचीन है। सूरदास, प्रेमधन आदि कवियों ने भी कजरी के मनोहर गीत रचे थे, जो आज भी गाए जाते हैं। कजरी का आरंभ देवी वंदना से होता है। कजरी गीतों में जीवन के विविध पहलुओं का समावेश होता है। इसमें प्रेम, मिलन, विरह, सुख-दु:ख, समाज की कुरीतियों, विसंगतियों से लेकर जन जागरण के स्वर गुंजित होते हैं। इस दिन स्त्रियां बागों में झूले ड़ाल कर झूला झूलती हैं। सावन में कजरी और झूला दोनों एक-दूसरे के पूरक से लगते हैं। सावन में स्त्रियां ही नहीं पुरूष भी मंदिर में जाकर भगवान को झूले में बिठाकर झूला झुलाते हैं। वे झूले में झूलते भगवान के दर्शन कर, उन्हें झूम-झूमकर मनभावनी कजरी सुनाते हैं। संयोग और वियोग श्रृंगार के अतिरिक्त कजरी में भक्ति, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा ऎतिहासिक चित्रण भी देखने-सुनने को मिलते हैं।